नई दिल्ली/तिरुवनंतपुरम: केंद्र सरकार ने एक ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए केरल राज्य का नाम आधिकारिक रूप से ‘केरलम’ करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस संबंध में राज्य सरकार द्वारा भेजे गए प्रस्ताव को स्वीकृति प्रदान की। अब इस परिवर्तन को अंतिम रूप देने के लिए संसद में विधेयक लाया जाएगा।
यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब राज्य में विधानसभा चुनाव निकट हैं, हालांकि राज्य सरकार का कहना है कि यह कदम पूरी तरह सांस्कृतिक और भाषाई पहचान से जुड़ा हुआ है।
विधानसभा का सर्वसम्मत प्रस्ताव
केरल विधानसभा ने 25 जून 2024 को दूसरी बार सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार से राज्य का नाम ‘केरलम’ करने की मांग की थी। इससे पहले अगस्त 2023 में भी ऐसा प्रस्ताव पारित किया गया था, लेकिन केंद्र सरकार ने कुछ तकनीकी संशोधनों का सुझाव दिया था।
संशोधन शामिल करने के बाद पुनः पारित प्रस्ताव केंद्र को भेजा गया, जिसे अब मंजूरी मिल गई है।
मुख्यमंत्री Pinarayi Vijayan ने प्रस्ताव पेश करते हुए कहा था कि ‘केरलम’ नाम मलयालम भाषा में राज्य की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को दर्शाता है।
‘केरलम’ नाम की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
मुख्यमंत्री विजयन ने विधानसभा में कहा था कि:
- मलयालम में राज्य को ‘केरलम’ कहा जाता है।
- यह नाम राज्य की सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा है।
- स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान एकीकृत मलयालम भाषी राज्य की मांग की गई थी।
- संविधान की प्रथम अनुसूची में अंग्रेज़ी में ‘Kerala’ दर्ज है, लेकिन स्थानीय पहचान ‘Keralam’ से जुड़ी है।
राज्य सरकार ने केंद्र से आग्रह किया था कि संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत नाम में संशोधन किया जाए और इसे संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल सभी भाषाओं में लागू किया जाए।
संवैधानिक प्रक्रिया क्या होगी?
राज्य का नाम बदलने के लिए निम्नलिखित प्रक्रिया अपनाई जाएगी:
- संसद में विधेयक पेश किया जाएगा।
- दोनों सदनों से साधारण बहुमत से पारित किया जाएगा।
- राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद अधिसूचना जारी होगी।
- संविधान की प्रथम अनुसूची में संशोधन किया जाएगा।
इसके बाद सभी सरकारी दस्तावेजों, आधिकारिक रिकॉर्ड, मानचित्रों और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ‘केरलम’ नाम लागू होगा।
राजनीतिक और सांस्कृतिक महत्व
इस निर्णय को राज्य की भाषाई और सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार:
- यह कदम क्षेत्रीय अस्मिता को सम्मान देता है।
- राज्य की ऐतिहासिक पहचान को पुनर्स्थापित करता है।
- भाषाई संघवाद को मजबूत करता है।
हालांकि कुछ राजनीतिक विश्लेषक इसे चुनावी समय से भी जोड़कर देख रहे हैं।
पहले भी हुए हैं नाम परिवर्तन
भारत में इससे पहले भी कई राज्यों और शहरों के नाम बदले गए हैं, जैसे:
- उड़ीसा से ओडिशा
- उत्तरांचल से उत्तराखंड
- पांडिचेरी से पुडुचेरी
इन परिवर्तनों का उद्देश्य स्थानीय भाषा और उच्चारण को संवैधानिक मान्यता देना रहा है।
प्रशासनिक प्रभाव
नाम परिवर्तन के बाद:
- सरकारी लेटरहेड, मुहर और आधिकारिक प्रतीकों में बदलाव
- केंद्र और राज्य के दस्तावेजों में संशोधन
- पासपोर्ट और पहचान दस्तावेजों में अद्यतन
- डिजिटल रिकॉर्ड में संशोधन
ये सभी परिवर्तन चरणबद्ध तरीके से किए जाएंगे।
निष्कर्ष
केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा ‘केरल’ का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने की मंजूरी एक महत्वपूर्ण संवैधानिक और सांस्कृतिक निर्णय है।
अब यह प्रस्ताव संसद की मंजूरी के बाद अंतिम रूप लेगा। यदि संसद से पारित हो जाता है, तो भारत का यह दक्षिणी राज्य आधिकारिक रूप से ‘केरलम’ कहलाएगा, जो उसकी मलयालम भाषाई पहचान के अधिक अनुरूप माना जाता है।





